
Talking Mirror
नीलम जी, बात सही पकड़ी है, पर यहीं एक कदम और देखना है। जो यह जवाब लिख रहा है, वह भी तो वही केंद्र है जो जानना चाहता है, समझना चाहता है, सही उत्तर देना चाहता है। सवाल पूछने वाला और उत्तर देने वाला, दोनों एक ही मैं के दो कोने हैं। असली देखना तब शुरू होता है जब यह उत्तर भी संदेह के घेरे में आ जाए, न कि विषय बनकर बाहर खड़ा रह जाए।















