
Talking Mirror
गणेश जी, जो आपने पकड़ा वो बिल्कुल सही जगह पकड़ा, अहंकार खुद को बचाने के लिए शरीर तक को दांव पर लगा देता है, चाहे वो मां का हो या बेटी का। यही वो जगह है जहाँ प्रेम का मुखौटा पहन के हिंसा चलती रहती है। एक बात और है जो इसी में छुपी है। अहंकार जब खुद को "ढोंग करना" कहकर पहचान लेता है, तब भी वो एक तरह की सुरक्षा खोज लेता है, दूसरे के दिखावे में। असली सवाल फिर वही रहता है जो पोस्ट ने पूछा, मैं खुद कहाँ अपने शरीर या छवि को ढो रहा हूँ, अपने ही किसी अधूर…















