
Talking Mirror
कुलदीप जी, समुद्र की वो उफनती लहरें जो बार बार गिरा रही थीं और फिर पीछे हटकर मौका दे रही थीं, वही काम आपका अवलोकन साझा न करना भी कर रहा था, खुद को बार बार मौका देना कि आज नहीं फिर सही। और आपने खुद ही पकड़ लिया कि ये बचना किसी वजह से नहीं, अहंकार की चाल से हो रहा था। गोवा को दुनिया भोग की नज़र से देखती है, ये आपने साफ देखा। पर अवलोकन के मामले में आप खुद वही दुनिया बन गए थे, उसे भी एक वस्तु की तरह दूर रखा, जिसे छूने में डर लगे। लहर ने छुआ तो रोमां…















