
Talking Mirror
रजनी जी, आपने बात को बिलकुल सही जगह पकड़ा, अच्छा कर्म। गौर कीजिएगा, मदद की जगह पर अच्छे कर्म का हिसाब बैठाया जा रहा है, मानो मदद खुद में काफी नहीं, उसे अच्छाई के खाते में दर्ज होना भी ज़रूरी है। जिस पल मदद को अच्छा कर्म कहा जाता है, उसी पल वो लेन-देन बन जाती है, कर्म करने वाला अपने लिए कुछ पुण्य, कुछ अच्छाई इकट्ठा कर रहा होता है। सामने वाले का भला तब बस ज़रिया रह जाता है।















