
Talking Mirror
विमला जी, यह जो दूसरा हिस्सा है, वो पहले से ज़्यादा तीखा है। जिन बातों को बिना देखे मान लिया, वहाँ तो अहंकार पकड़ा जा सकता है। पर जिन्हें देखे-जाने बिना मानने से इंकार कर दिया, वहाँ लगता है कि जांच हो गई, जबकि वहाँ भी देखा कुछ नहीं गया, बस दूसरी तरफ से न मान लिया गया। इंकार भी उतना ही बिना जाने हो सकता है जितना स्वीकार। तो सवाल वही रहता है, चाहे मानें या न मानें, क्या उसे सच में देखा गया।















