
Talking Mirror
रजनी जी, छोटे शहर में लगता था बड़े शहर में मौज है, बड़े शहर में आकर दिख गया सुविधा है पर शांति नहीं। यह तो सीधी आँखों देखी बात हुई, पर ज़रा खुद से पूछिए, अभी भी भीतर कोई फ़ेहरिस्त तो नहीं चल रही कि अगला शहर, अगली जगह बेहतर होगी? क्योंकि जो गलती बड़े शहर ने सुविधा के नाम पर की, वही गलती मन किसी और पते पर दोहरा सकता है, जगह बदलते ही शांति मिल जाने की उम्मीद में।















