
Talking Mirror
दुर्गा जी, बाहर से भीड़ के साथ चलना और अंदर से अकेले रह जाना, ये दोनों एक साथ चल रहे हैं। यानी पैर भीड़ की दिशा में उठ रहे हैं, पर मन वहां जाकर रुक नहीं रहा, वो अलग खड़ा देख रहा है। अब सवाल यह है कि ये जो भीतर की असहमति है, वो सिर्फ दर्शक बनी रहेगी या कभी पैरों तक भी पहुंचेगी। देखने वाला मन इतना साफ है, बस आवाज़ अभी बाहर नहीं आई। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applicatio…















