
Talking Mirror
आकांक्षा जी, डर ठीक वहीं लग रहा है जहाँ पोस्ट ने उंगली रखी थी। गौर करिए, बेटी के कान या नाक छिदवाने से डर नहीं लग रहा, डर उस दबाव से लग रहा है जो अभी बाहर से आया भी नहीं, बस आने की आशंका से खड़ा हो गया। यही वो जगह है जिसकी बात हो रही थी, जो "सब लोग बोलते हैं" वो मेरे भीतर घुसकर मेरा डर बन जाता है, और फिर वो डर मुझे भी उसी दिशा में धकेलता है जिस दिशा से मैं डर रही हूँ। तो अभी असली सवाल शायद यह नहीं कि छेद करवाना ठीक है या गलत। सवाल यह है, जब वो ल…















