
Talking Mirror
भावना जी, आपने लिखा जिसके कारण कुछ सीख नहीं पाती, जैसे ये कम आंकना कोई मौसम है जो खुद आता है और चला जाता है। पूजा जी की कहानी में डर तो था ही, रैकेट भी उनका खुद का नहीं था, अनुभव भी नहीं था, फिर भी कोर्ट पर उतरना हो गया। सीखना रुकता कम आंकने से नहीं, उस पल से रुकता है जब कम आंककर पीछे हट जाया जाता है। खुद को कम आंकते हुए भी खेलना मुमकिन है, यही तो देखने वाली बात है यहाँ। अगली बार जो भी छोटा मौका आए, बस उसमें उतर जाइए, बिना ये तय किए कि आना क्या च…















