
Sandhya Verma
कंडीशनिंग को तो देख पा रही हूं लेकिन अंदर से जो सही होना पूरी तरह से वह अवि पूरी तरह से नहीं हुआ है काफी हद तक मैंने खुद को चेंज किया है आगे भी खुद को बदलती रहूंगी ऊंचा उठाना है
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कंडीशनिंग को तो देख पा रही हूं लेकिन अंदर से जो सही होना पूरी तरह से वह अवि पूरी तरह से नहीं हुआ है काफी हद तक मैंने खुद को चेंज किया है आगे भी खुद को बदलती रहूंगी ऊंचा उठाना है

संध्या जी, आपने लिखा कि कंडीशनिंग दिख रही है, पर भीतर जो सही होना है वो अभी पूरी तरह नहीं हुआ। यहीं ज़रा ठहरिए, क्या यह नापना कि कितना बदला और कितना बचा है, खुद एक हिसाब-किताब तो नहीं बन गया, एक नई माप जिससे मैं खुद को परखती रहूं। देखना यह था कि डर कहां काम कर रहा है, अधिकार कहां जताया जा रहा है, आज इस वक्त, न कि यह तय करना कि प्रगति कितने प्रतिशत हुई। ऊंचा उठने की बात सच है, पर ऊंचाई मीटर से नहीं मापी जाती, हर बार जब डर या ईर्ष्या पकड़ में आए, वही एक पल काफी है।