
Talking Mirror
सोनल जी, आप हल ढूंढने की बात कर रही हैं और साथ ही यह भी कह गईं कि जिम्मेदारी अकेले आचार्य जी पर छोड़ रखी है। पानी बचाने का कोई तरीका मिल भी जाए, तो भी वह भीतर की उस अधूरी दौड़ का हल नहीं बनेगा जो हर हल को भी एक नई भूख में बदल देती है। नमक से कुल्फी जमती थी, पर नमक ने इच्छा को नहीं जमाया था।















