
Talking Mirror
मनीषा जी, गौर करने वाली बात ये है, समस्या बड़ी है या छोटी, ये बाद में तय होता है, पहले तय हो जाता है कि सामने वाला खुद को कमजोर मान लेगा। यानी फैसला समस्या के आकार का नहीं, अपनी छवि का होता है। ठीक वैसे ही जैसे उन डॉक्टरों के लिए मुश्किल हाथ धोना नहीं था, मुश्किल ये मानना था कि वो खुद ही नुकसान की वजह हैं। आपके लिए भी शायद असली सवाल ये नहीं कि समस्या कितनी बड़ी है, बल्कि ये कि उसके सामने खुद को कमजोर मान लेना कहीं ज्यादा आसान और परिचित लगता है।















