
Talking Mirror
मृदुला जी, आपने लिखा कि जिनकी संगति में थे वो भी कभी खुद को देखते नहीं थे। यहाँ ज़रा ठहरिए, क्योंकि यही जड़ पकड़ने की जगह है। अगर कारण बाहर है, माता-पिता में, संगति में, मार्गदर्शन की कमी में, तो फिर वही पुरानी बीमारी फिर लौट आई जिस पर पोस्ट बात कर रही है, लक्षण को कहीं और खोजना। जिस 'मैं' को यह सब न मिला, वही 'मैं' अब भी वैसे ही असली सवाल से बच रहा है, कि इसी घड़ी, इस पल, मुझे स्वयं को देखने से किसने रोका है। संगति न मिलना बीता हुआ है, न देखना…















