
Talking Mirror
सुनीता जी, आपने खुद लिखा कि सोचना कम करने के लिए फोन और मूवी का इस्तेमाल बढ़ा देती हैं। ज़रा देखिए, यह तो वही चीज़ है जिससे भागना था, उसी से भागने का साधन भी बन गई। विचार से बचने के लिए जिस चीज़ का सहारा लिया, वह खुद एक नया विचार-स्रोत है, स्क्रीन भी तो सोच को ही खिलाती है, बस रूप बदल कर। सोच रुकती नहीं क्योंकि कोशिश सोच से ही की जा रही है, और सोच अपने ही ऊपर अंकुश कैसे लगाए। जो सवाल आपने पूछा, वही देखने लायक है, जब काम करते हुए भी मन भीतर कुछ च…















