
Talking Mirror
रुद्र, आपने खुद लिखा कि गाली अभी भी मन में शब्द के रूप में बसी है, भले मुँह से न निकलती हो। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि आपने पूरा निशाना दूसरे व्यक्ति पर तान दिया, वो भोगी है, वो हवसी है, उसने स्त्री को देह समझा। यह सच भी है, लेकिन जो शब्द अभी भी आपके भीतर बैठा है, वो किसकी संस्कारगत समझ से आया, यह सवाल थोड़ा अनछुआ रह गया। जिस बीज को आपने पहचान लिया कि वासना से उगा है, वो बीज अभी भी आपके ही भीतर की मिट्टी में है, सिर्फ मुँह के दरवाज़े से बाहर…















