
Sakshi Mhaske
मेरी भाषा तो ज़्यादातर सकारत्मक ही होती हैं जब किसी के साथ सत्य की बात रखने जाती हूं। क्योंकि मैं ये तर्क लेकर चलती हूं कि अगर मैंने नकारात्मक भाषा में बात करी तो सामनेवाला पूछेगा क्विंट नहीं तो फिर क्या है। मतलब सत्य क्या नहीं है ये तो ठीक हैं लेकिन फ़िर सत्य क्या है? कुल मिलाकर मै सामनेवाले के हिसाब से बोलती हूं, जैसे सामनेवाला सकारात्मक ही चाहता है और इधर मैं भी चाहती हूं कि ज़्यादा तर्क न करने में ही सुरक्षा है। अहंकार हमेशा सकारात्मकता में…















