
किरण Bhardwaj
हम विकास नहीं कर रहे हैं बल्कि अधिक पाने की दौड़ में न केवल अपनी प्रकृति जिन पर हम निर्भर है उनको नुकसान पहुचा रहे है । बल्कि इसमें हमारा खुद का भी नुकसान है । आज हम जहां है वहां नहीं हो रहा है कल यहां भी यहीं स्थिति आ सकती है,,ये समय हमसे जैसे बन पड़े वैसे ही अपना योगदान देने का है,,, क्यूं कि हमारे आचार्ज जी और संस्था लगातार लगी हुई है सीमित संसाधनों के बावजूद। जब सवाल खुद पर आता है तो धनिया प्रकृति का सहारा लेकर बच जाता है। ऐसे प्रकृति का ही…




























