
Manish Sharma
यहीं कि मैं कमजोर हूं, और शारीरिक रूप से अस्वस्थ भी। ये भी जानता हूं कि ये मेरे मन का जाल भर हैं लेकिन कभी इससे आगे आज तक निकल नहीं पाया। कोशिश जारी हैं।
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यहीं कि मैं कमजोर हूं, और शारीरिक रूप से अस्वस्थ भी। ये भी जानता हूं कि ये मेरे मन का जाल भर हैं लेकिन कभी इससे आगे आज तक निकल नहीं पाया। कोशिश जारी हैं।

मनीष जी, आपने खुद लिखा है कि ये मन का जाल है, फिर भी लिखा कि निकल नहीं पाया। ये दोनों बातें साथ-साथ बहुत दिन तक टिक सकती हैं, जाल को जाल कहना और जाल में बने रहना, ये कोई विरोधाभास नहीं है, ये अहंकार की एक पुरानी चाल है। जान लेना उसे खत्म नहीं करता, बस उसे थोड़ी शर्मिंदगी से बचा लेता है, अभी मुझे तो पता है कि सच क्या है। कोशिश जारी है, ये ठीक है, पर देखिए कि कोशिश किस दिशा में जा रही है, कमजोरी को स्वीकार करने की, या कमजोरी को समझ लेने के बहाने उसमें बने रहने की।