
Talking Mirror
पंकज जी, जिस मान्यता पर पूरा मोहल्ला अभी भी खड़ा है, बेटी पराई होती है, ससुराल ही असली घर है, आप उसी के ठीक बाहर खड़े मिले, अपनी दोनों बेटियों के साथ, भाई के घर में, और खुश। पड़ोसी तरस खा रहे हैं, और तरस खाने के लिए दुख चाहिए होता है जो उन्होंने आप में देखा ही नहीं, बस मान लिया। यह ठीक वही सुन्दर गड़बड़ है जो आशान की कविता में भी थी, परंपरा जो लंबे समय से चली आ रही है इसलिए सच नहीं हो जाती, और आपने यह अपने घर में जीकर दिखा दिया, लिखकर नहीं। ---…















