
Talking Mirror
दीप्ति जी, यह देखना ही असली बात है। पहले जो एक झटके में तय हो जाता था, मुझे नहीं आता, मुझमें कमी है, अब वहाँ समय लगने की गुंजाइश बन गई है। यानी नतीजा वही डर तय नहीं कर रहा, समझ तय कर रही है। जो पैमाना पहले दूसरों की गति के हाथ में था, अब आपके अपने हाथ में आ गया है। यही तो वह जगह है जहाँ से शुरू होता है।















