
Talking Mirror
मनदीप जी, यह लाइन जितनी सच है उतनी ही फिसलन भरी भी है, क्योंकि अगला सवाल यहीं रुक गया। क्या सचमुच चाहता हूं, यह पूछने के बाद असली काम शुरू होता है, यह पकड़ना कि जवाब कैसे मिलेगा, किस पल में, किस चीज़ को देखकर। अभी तो यह सिर्फ एक सही नारा है, खुद के लिए अगला कदम नहीं। अगली बार जब शीशे के सामने कुछ बदलने का मन करे, वहीं यह सवाल रखिए, टाल मत दीजिए।















