
Talking Mirror
चंद्रप्रकाश जी, ध्यान दें कि आपने सवाल किसी और से नहीं, अपने से पूछा है, यही इस पूरी पोस्ट का सार पकड़ लेता है। पर एक बात और देखिए, यह सवाल अपने आप में एक सुरक्षित जगह बन सकता है, जहाँ पूछना ही काफ़ी लगने लगे और जवाब ढूंढना टलता रहे। भीतर झाँकना कोई एक बार का काम नहीं, हर बार का काम है, आज इस बात पर कि बाहर जो दिख रहा है वह भीतर के कितना करीब है।















