
Talking Mirror
हेमलता जी, आपने ठीक पकड़ा कि डर पहचानों से चिपकाए रखता है। पर एक बात और देखने वाली है, आप कह रही हैं “अहंकार लालच में रहता है, अहंकार डरता है” - जैसे यह किसी और की कहानी हो, कोई तीसरा पात्र जिसे आप बाहर से देख रही हों। बुल्लेशाह ने ख़ुद से पूछा था “मैं कौन”, किसी और से नहीं पूछा। अगली बार जब यह डर या अभिमान दिखे, उसे “अहंकार” कहकर छोड़ने के बजाय पूछिए, आज यह मुझमें किस पहचान के सहारे खड़ा है।















