
sonia swaraj
हम बहुत ही करीबी संबंधों में भी हिसाब किताब रखते है।अपनी मदद,उपकार,त्याग सबको अपने रिश्तों में ढोते हैं।जब किसी समय अपना कहकर किसी के लिये कुछ करते है लेकिन बदले में स्वीकृति नहीं मिलती ,अपमान मिले तो अहंकार अपने उपकार ,त्याग को बदले के भाव में बदल देता।वो दुःखी रहना स्वीकार करता और लगातार इस वृत्ति के कारण मानसिक रूप से बीमार भी हो जाता।लेकिन उसकी मनोरोग किसी को नहीं दिखती। परंतु,अहंकार खुद को इस दुख से बाहर कैसे निकाले?















