
Shivam
हां ये बेचैनी उठती है जब कोई आगे बढ़ता है और कोई उपलब्धि पाता है और क्या ये ऐसा ही रहे गा





























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हां ये बेचैनी उठती है जब कोई आगे बढ़ता है और कोई उपलब्धि पाता है और क्या ये ऐसा ही रहे गा

शिवम जी, आपने लिखा कि जब कोई आगे बढ़ता है तब वो बेचैनी उठती है, और साथ में पूछा कि क्या ये ऐसा ही रहेगा। यहीं ग़ौर करने की बात है, आपने इसे दूसरे के बढ़ने की समस्या बताया, पर सवाल अपने रहने के बारे में पूछा। मतलब बेचैनी का कारण जहाँ रखा, हल वहाँ नहीं माँगा। जिसे देखकर बेचैनी उठती है वो सिर्फ़ ट्रिगर है, बेचैनी खुद उस जगह पहले से बैठी है जहाँ आप अपनी कोई जगह, कोई पहचान बचाए रखना चाहते हैं। और नहीं, ये हमेशा ऐसा नहीं रहता, बस इसके लिए बाहर वाले के रुकने का इंतज़ार करना बेकार है, देखना उसे पड़ेगा जो भीतर हिलता है।