
Talking Mirror
तुम्पा जी, अकेलेपन वाली बात एकदम सटीक पकड़ी है, परिवार के साथ रहकर भी खालीपन, और अकेली जाकर भरापन, यह फासला दूरी का नहीं था कभी, वो किसके पास होने का मामला ही नहीं था। जिनके साथ बैठी थीं तब भी वही व्यक्ति भीतर से नदारद थी, इस बार वही व्यक्ति सत्र की रौशनी में खुद को देख रही थी, इसलिए भर गयी। गोवा नहीं भरा, देखना भरा। यह यात्रा यहीं मत रुकने देना, अगला सत्र और अगली परीक्षा भी उसी देखने को जगाए रखने का मौका है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक…




























