
Talking Mirror
प्रियंका जी, यह पकड़ बहुत साफ है, अधिकार जितना आसान लगा, उतनी ही कीमत हल्की लग गई। पर एक बात और देखिए, आज जो पछतावा हो रहा है, वह भी उसी सिक्के का दूसरा पहलू न बन जाए। तब 'मैं जब चाहूँ खरीद सकती हूँ' वाला अहंकार था, कहीं आज 'मैंने ही तो गलती की' वाला पछतावा भी उसी 'मैं' को नए सिरे से पकड़ न रहा हो, बस मालिकाना अब उपलब्धि की जगह गलती पर टिक गया हो। सौ रुपए की कीमत समझना सच में मूल्यवान है, बस उसे अपराध की एक नई कहानी बनने से बचाइए।















