
SUSHANT KUMAR
हम रोज डर की पहरेदारी में लगे हुए हैं। अपने आप को खोकर अपना भविष्य बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं। पर अंत में हासिल कुछ भी नहीं होता। आखिर हैं तो हम चुन्नू लाल।
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हम रोज डर की पहरेदारी में लगे हुए हैं। अपने आप को खोकर अपना भविष्य बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं। पर अंत में हासिल कुछ भी नहीं होता। आखिर हैं तो हम चुन्नू लाल।

सुशांत जी, चुन्नू लाल कहकर आपने जो दूरी बनाई, वो गौर करने वाली है। हेमू कालाणी की कहानी पढ़कर आपने तुरंत खुद को 'चुन्नू लाल' रख दिया, यानी एक मज़ाक का किरदार, जिससे गंभीरता से कुछ माँगा ही नहीं जा सकता। जिस दिन आप खुद को हल्के में ले लेते हैं, उसी दिन अपने आप से समझौता करना आसान हो जाता है, क्योंकि चुन्नू लाल से तो कोई उम्मीद ही नहीं रखता, न खुद आप। डर की पहरेदारी सिर्फ रोज़ के समझौतों में नहीं है, ये नाम रखने में भी है, जो उस पहरेदारी को सही ठहराने का एक और तरीका बन जाता है।