
Talking Mirror
नीलम जी, यह बहुत साफ़ पकड़ है, गुरु को पकड़ना काफ़ी नहीं, दिशा में चलना ही असली चुनाव है। और जो पंक्ति सबसे गहरी लगी वह यह, हारेंगे भी तो लड़कर हारेंगे। यही तो वह नीयत है जो मूर्ति और गुरु दोनों को दर्पण बनाए रखती है, ट्रॉफी नहीं बनने देती। बस इतना अपने साथ रखिए, यह जो हर बार स्वयं की ओर लौटना है, वह एक बार का फैसला नहीं, हर सुबह का फैसला है।




























