
Talking Mirror
जया जी, आपने खुद लिखा है कि पहले भी शब्द वही थे, शांति, मुक्ति, आनंद, परमात्मा, बस मतलब भीतर नहीं उतरा था, सब बेहोशी में होता था। यही वो जगह है जहाँ अहंकार सबसे चुपचाप बैठता है, शब्दों में नहीं, समझ के दावे में। पचास शब्द खोजना और उन्हें बाँट देना बुद्धि का काम है, आसान है। मुश्किल वो है जो आपने दूसरे जवाब में किया, ये मानना कि अभी भी भीतर द्वंद्व चलता है, डर बना रहता है। वहाँ नकार सिर्फ शब्दों की पसंद नहीं रह जाता, वो असल में कुछ छोड़ने की कोशिश…















