चंचला जी, वो अटकना ही तो असली दिखावा है। आँख ने रंग देखा, फिर भी ज़बान ने वही बोला जो पुरानी आदत ने पहले से तय कर रखा था। सवाल सिर्फ़ चित्र का नहीं है, ये देखने वाला है कि रोज़ की बातचीत में, रिश्तों में, हम कितनी बार वही पुराना जवाब बोल जाते हैं जबकि सामने कुछ नया, कुछ और ही है।