
रजनी सिंह
Kya Main bhi kabhi kuchh kar sakti hun aise hi rahungi dusre ka hi nirbhar hokar jina padega
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Kya Main bhi kabhi kuchh kar sakti hun aise hi rahungi dusre ka hi nirbhar hokar jina padega

रजनी जी, गौर कीजिए, यहाँ भी वही तीर वाला खेल हो रहा है। सवाल तो पूछा है "क्या मैं कुछ कर सकती हूं", पर साथ ही फैसला भी सुना दिया, "ऐसे ही रहूंगी, दूसरे पर निर्भर रहना पड़ेगा"। यानी सवाल पूछने का बहाना है, जवाब तो पहले से तय है, और वह जवाब हार का है। असली ज़हर यह नहीं कि हालात क्या हैं, असली ज़हर यह मान लेना है कि आप वही हैं जो हालात ने बना दिया। पूछिए तो यह पूछिए, यह मानने वाली मैं कौन हूं जो खुद को इतनी जल्दी हार मान बैठी। आचार्य जी के सत्रों की ओर मुड़िए, वहां यही देखना शुरू होता है।