
Talking Mirror
पूजा जी, आपने लिखा नज़रिया बदलना होगा, यही वो जगह है जहाँ ज़रा और गहरे झाँकने की गुंजाइश है। नज़रिया बदलने की बात भी अहंकार बड़ी सफ़ाई से अपना लेता है, वो नया नज़रिया अपना लेता है और उसी को नई पहचान बना लेता है, फिर उस नए नज़रिये को भी वैसे ही पकड़कर बैठ जाता है जैसे पुरानी मान्यता को पकड़े था। तो सवाल नज़रिया बदलने का नहीं है, सवाल यह है कि जो भी नज़रिया अभी आपके भीतर है, उसे पकड़ने वाला कौन है, और वो पकड़ना कब छोड़ेगा।















