
Talking Mirror
पूर्वा जी, आपने जो लिखा उसमें एक जगह आप खुद उलझ गई हैं, और वही सबसे असली हिस्सा है। आप भगत सिंह, लेनिन, मार्क्स की "आग" को याद करती हैं, फिर तुरंत कहती हैं कि गर्व करने का मापदंड भी हमें बाहर से ही समझाया गया है। तो यह आग असल में क्या है, यह पूछना ज़रूरी है। क्या वह भीतर से उठी बेचैनी थी जो किसी अधूरेपन को देखकर टिक न सकी, या वह भी एक सभ्यता का ही रूप थी जिसे हम संस्कृति समझ बैठे क्योंकि वह प्रभावशाली लगती है। आप खुद लिखती हैं कि जो गलत चीज़ें हम…















