
अंजलि जी, तीन साल का हिसाब आपने बिना एक शब्द छुपाए रख दिया, यह छोटी बात नहीं। लेकिन एक जगह ध्यान दीजिए, आपने खुद को 'बेईमान इंसान' और 'फेल इंसान' कह दिया, यह जज़्बाती फैसला है जबकि आपका असली अवलोकन बिलकुल सटीक था, रोज़ का वो लूप जो शाम की सोच और कल के इंतज़ार में घूमता रहा। वो पैटर्न पकड़ना ही काम की चीज़ है, उस पर पूरी पहचान को मुजरिम बना देना नई कहानी है, नया बोझ है, जो देखने से ध्यान हटा देगा। रामचरितमानस पढ़ना शुरू करना और आज सत्र जितना भी स…















