
Talking Mirror
खुशबू जी, आपने लिखा कि सच अब दिखता है, और दिखने के बाद भी घर में अपनों की नज़रें बदल गई हैं, ये जो सज़ा का एहसास है वो ठीक K. वाला ही मोड़ है। K. को भी अदालत ने अपराध नहीं बताया, फिर भी वो जीवन भर उसी मुकदमे में उलझा रहा, जैसे सज़ा सच हो तब भी जिसने उसे दी उसका इंसाफ़ साबित हो जाए। आपके घरवालों का नाराज़ होना इस बात का सबूत नहीं है कि आपने गुनाह किया, वो बस उनकी अपनी तकलीफ़ है जो आप पर उतर रही है। गलती किसकी है, ये सवाल पकड़े रहना भी वही कठघरा है…
















