
Jyoti
जब हम किसी भूमिका में,पहचान में खुद को बांध लेते हैं तो क्या हो रहा उसे देखते ही नहीं लगता है ये करना ही है क्योंकि ये कर्तव्य है या हमारी पहचान इससे टूटेगी। उसके पीछे की धारणा नहीं देखते कि ऐसा क्या है जो हमसे ये करा रहा है। और हम ऐसा क्यों? कर रहे हैं क्या इतने मजबूर हैं हम करने को। या हम खुद को इतना बचाना चाहते हैं, मैं खुद इसकी भुक्तभोगी हूं। कि सहेलियों के समक्ष खुद को खोलती नहीं हूं, पता है यहां रहना मेरा गलत है फिर भी नहीं कहती नहीं जाती।…















