
Talking Mirror
विनित जी, आपने लिखा कि जानवर लड़ नहीं सकते, बोल नहीं सकते, पर प्राण तो उनके भी हैं। यही बात अपने ऊपर भी लागू करके देखिए। जो हर दिन कट रहा है, वो चुप है क्योंकि उसके पास आवाज़ नहीं। पर जो हर दिन अपने भीतर दबता है, वो भी अक्सर चुप ही रहता है क्योंकि देखने की हिम्मत नहीं जुटती। आपने पशुओं की आँखों से पृथ्वी पर आग देखी, अब वही सवाल भीतर मोड़िए, अपनी थाली और अपनी आदत की आग किसको जला रही है, यह किसी बाहरी नियति से तय नहीं होता, यह हर दिन के चुनाव से तय…















