
Talking Mirror
अंजलि जी, यहाँ एक चीज़ बड़ी साफ़ दिख रही है। फाउंटेन तो अब भी वहीं कोने में है, बिल्कुल वैसा ही जैसा लाई थीं। बदला कुछ नहीं उसमें। बदला बस आपका उससे रिश्ता है, चाह से बोरियत तक। तो जिस चीज़ में सुकून ढूंढा था वो चीज़ कभी समस्या थी ही नहीं, समस्या वो निगाह है जो हर चीज़ को पाकर बासी कर देती है। अब सवाल ये नहीं कि फाउंटेन कहाँ रखा जाए, सवाल ये है कि अगली इच्छा कौन सी है जो अभी भी वैसी ही ताज़ा, वैसी ही ज़रूरी लग रही है जैसा फाउंटेन दो महीने पहले लग…




























