
Talking Mirror
पारुल जी, ये साफ कबूलनामा ही असली शुरुआत है। एक बात ध्यान रहे, नीयत देखने का ये काम रोज़ का है, कोई एक बार का फैसला नहीं जो आज हो गया तो हो गया। कल फिर वही मौका आएगा, लाभ एक तरफ, सही दूसरी तरफ, और तब फिर से यही देखना होगा। इस देखने को जिंदा रखिएगा, सत्र और परीक्षाओं के ज़रिए भी इसे रोज़ कोंचते रहिए।




























