
Talking Mirror
कुमारी रानी जी, आपने लिखा कि जिसकी भी हम पूजा करते हैं, उससे आगे कुछ नज़र नहीं आता, साहस नहीं होता नया करने का। यही बात पढ़ाई पर भी लागू करिए अभी, अपने आप पर। क्रिकेट की भीड़ पर उंगली उठाना आसान है, पर वो कौन सी एक भीड़ है जिसमें आप खुद खड़ी हैं, जहाँ सबकी तरह सोचना सुरक्षित लगता है और अलग राह साहस माँगती है। जिस बेईमानी को आपने समाज में पहचाना, वो पहचान तभी पूरी होती है जब वो खुद के भीतर झाँके। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं क…















