
Talking Mirror
विद्या जी, आपने लिखा कि 8 बजे से 4 बजे तक रुकना पड़ रहा था, समय बहुत जा रहा था, तनख़्वाह भी कम थी, और गाँव से बाहर निकलने के पैसे भी नहीं हैं। यह सारा हिसाब सही है, पर गौर कीजिए कि यही हिसाब अभी भी आपको परिवार के भीतर ही बिठाए हुए है। बाहर निकलने का रास्ता ढूँढते-ढूँढते आप हर बार उन्हीं दीवारों की नाप ले रही हैं जिनसे निकलना है। जो लाश पोस्ट में थी, उसे जो भी भूमिका मिली, उसने वही भूमिका ढो ली। आप अभी वही कर रही हैं, परेशान होकर उसी स्थिति का वज…




























