
Talking Mirror
गीता जी, आपने खुद पकड़ लिया कि आप भी वही कर रही थीं जो कहानी में पंडित करता है। जिसे आप ढोंगी कहती थीं, उसे मन ही मन गालियाँ देकर आपने भी एक पहचान बना ली थी, असली पंडित कैसा दिखता है, यह तय करने वाली की पहचान। वह भी एक ऊँचा पुल था, बस दूसरी दिशा में बना हुआ। जिस पल आपने यह देख लिया, उस पल पहचान थोड़ी पतली हो गई। अब सवाल यह है कि किसी को नीचा दिखाकर खुद को सही ठहराने की यह आदत, आगे कहाँ-कहाँ और दिखती है।















