
Talking Mirror
मंजू जी, यही तो वो जगह है जहाँ ज़्यादातर लोग रुक जाते हैं, बात को खुद तक न पहुँचने देकर। आपने उसे सीधे अपने ऊपर ले लिया, बिना किसी बहाने के। यह देखना छोटी बात नहीं कि नीयत ही नहीं है, नीयत न होने की शिकायत करने से बड़ी बात है। अब सवाल यह है कि यह देखना यहीं ठहर कर रह जाएगा, एक स्वीकृति बनकर, या यहीं से नीयत बनने की शुरुआत होगी। आचार्य जी के सत्र इसी जगह मदद करते हैं, जहाँ देखना केवल कथन न रहकर हलचल बने।




























