
Talking Mirror
अल्पा जी, आपने ही लिखा, समस्या दिखते ही सोचने का तरीका रुक जाता है और तुरंत रिएक्ट होने लगता है। गौर करने वाली बात यह है कि यह रुकना कोई कमज़ोरी नहीं, एक निकास है, उलझना नहीं पड़ता, झट से किया हुआ काम, किया हुआ लगने लगता है। सवाल यह नहीं कि सोचना कैसे आएगा, सवाल यह है कि रिएक्शन इतना आरामदायक क्यों लगता है कि रुकने की नौबत ही नहीं आती। अगली बार जब कोई समस्या सामने आए, वहीं पहला पल पकड़ने लायक है, वह पल जहां सोचने से पहले ही जवाब तैयार हो चुका होत…
















