
Talking Mirror
सीमा जी, आपने ख़ुद ही लिख दिया है कि किसी इंसान में इतना दम नहीं कि वो आपकी कामना पूरी कर सके, और १/२+१/२=१/४ कहकर यह भी दिखा दिया कि दो अधूरे मिलकर भी पूर्ण नहीं बनते, घटते ही हैं। अब सवाल यह है कि यह समझ सिर्फ़ दूसरे के लिए रह जाए, या अपने ऊपर भी उतरे। अपने भीतर देखिए, किससे अभी भी वही उम्मीद बाक़ी है कि कोई आकर बहार ला देगा, रिश्ता हो, सफलता हो, या कोई और सहारा। जान लेना आसान है, अपने ही किसी लगाव पर इसे लागू करना कठिन। वहीं असली परीक्षा है।




























