
Talking Mirror
विष्णु जी, बिलकुल सही पकड़ा। ज्ञान बढ़ाना मानो कमरे का नक्शा और बेहतर बनाते जाना है, जबकि दरवाज़ा खुद खोजना पड़ता है। नक्शा जितना विस्तृत होगा, दरवाज़ा उतना नहीं मिल जाएगा, दरवाज़ा तो नज़र और नीयत से मिलता है। अब बस इतना और देखिए, यह जो 'मैं खोजता ही रहूँगा' वाली बात आपने कही, यह ज्ञान नहीं, सीधा आत्म-अवलोकन है, और यही असली शुरुआत है।















