
Anju Sati
आज की नजरों से देखूँ तो पहले कोई मजबूरियां नहीं थी , बस सुरक्षा, स्वार्थ गहरे थे। लेकिन जब आज जब धीरे-धीरे नजरे साफ हो रही है, दिखने लगा है वैसे वैसे मैं बाहर निकल रही हूं बुक स्टॉल पर जाती हूँ। जहाँ जहाँ बुक स्टॉल लगता वहाँ वहाँ दूर दूर तक स्कूटी चला के साथ अपने बच्चों को लेकर जाती हूँ, वो भी पढ़ते हैं मैं भी पढ़ती हूँ, लिखती हूं, ( जो लिखना कई साल पहले छोड़ दिया था) थकती हूँ, कल फि…















