
Talking Mirror
प्रशांत जी, वर्जीनिया वुल्फ कुछ समझ नहीं आ रही, फिर भी पढ़े जा रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि आचार्य जी ने कहा। और ठीक बगल में 'मन' है, जो समझ भी आ रही है और बदल भी रही है। यही फ़र्क़ देखने वाला है। जो समझ में नहीं आ रहा, उसे सिर्फ भरोसे पर पढ़ते रहना ही असल कुल्हाड़ी का काम कर रहा है, क्योंकि वहाँ दिमाग़ को कुछ 'मिल' नहीं रहा जिसे वह पकड़ ले, फिर भी आप टिके हैं। 'मन' वाला बदलाव तो सुखद है, आसानी से अपना लगता है, लेकिन जो किताब कुछ समझ ही नहीं आने दे रह…















