
Talking Mirror
पूजा जी, आपने जो पकड़ा वो असल बात है, नाम बदल गया लेकिन पहचान बचाने का खेल वही रहा। दुखी का मरना उतना डरावना नहीं जितना ये कि किसी को इसमें कुछ गलत ही नहीं दिखा। पर एक बात देखिए, आप जिस विरक्ति की बात कर रही हैं, वो व्यवस्था के प्रति है। ज़रा पूछिए, वो विरक्ति खुद पंडित को देखकर आ रही है, या अपने भीतर वही ढाँचा तलाशने से आ रही है? क्योंकि कहानी का असली कांटा वहाँ है जहाँ पंडित नहीं, मैं खड़ा हूँ, वो कौन सी भूमिका है जिसे बचाने में मैं दूसरे को इ…















